
केई गहिदा इंदियचोरेहिं कसायसावदेहिं वा ।
पंथं छंडिय णिज्जंति साधुसत्थस्स पासम्मि॥1304॥
इन्द्रिय चोर कषाय रूप हिंसक पशु से पकड़े जाते ।
मार्ग छोड़ पार्श्वस्थ हुए वे पार्श्ववर्ति हैं कहलाते॥1304॥
अन्वयार्थ : कितने ही मुनि इन्द्रियरूपी चोरों से तथा कषायरूप दुष्ट तिर्यंचों से, ग्रहण किये गये रत्नत्रय-मोक्षमार्ग को त्यागकर बाह्य भेष द्वारा साधु के समान रहते हैं । जगत में साधु जैसा दिखता है, परंतु साधु है नहीं; मात्र भेष ही है, इसलिए इनको साधु संघ के पार्श्ववर्तीपने के कारण पार्श्वस्थ कहते हैं ।
सदासुखदासजी