
तो साधुसत्थपंथं छंडिय पासम्मि णिज्जमाणा ते ।
गारवगहणकुडिल्ले पडिदा पावेंति दुक्खाणि॥1305॥
मार्ग छोड़ संघ पास रहें जो पार्श्वस्थ हैं हो जाते ।
ऋद्धि रस गौरव सातों से भरे विपिन में दुःख भोगें॥1305॥
अन्वयार्थ : जो साधुसमूह का मार्ग छोडकर पार्श्वस्थपने को प्राप्त हुए हैं, वे अभिमान तथा रसगारव, ऋद्धिगारव और सातगारव से आच्छादित पार्श्वस्थपने रूप वन में भ्रमते हुए दु:खों को प्राप्त होते हैं ।
सदासुखदासजी