
सल्लविसकंटसहिं विद्धा पडिदा पडंति दुक्खेसु ।
विवसकंटयविद्धा वा पडिदा अडवीए एगागी॥1306॥
विषमय काँटों से बिंधकर ज्यों नर अटवी में दुःख भोगे ।
शल्यरूप कंटक से बिंधकर पार्श्ववर्ति मुनि दुःख भोगे॥1306॥
अन्वयार्थ : जैसे विष-कंटक से विंधा पुरुष जंगल में अकेला ही पडा हुआ दु:ख पाता है; तैसे ही माया, मिथ्यात्व और निदान - इन शल्योंरूप विषकंटकों से विंधा साधु भी दु:खों को भोगता है ।
सदासुखदासजी