
इंदियकसायगुरुयत्तणेण चरणं तणं व पस्संतो ।
णिद्धम्मो हुसवित्ता सेवदि पासत्थसेवाओ॥1308॥
इन्द्रिय-विषय-कषाय तीव्र से चारित को तृणसम लखता ।
धर्महीन होकर पार्श्वस्थ मुनी की वह सेवा करता॥1308॥
अन्वयार्थ : जो मुनिव्रत अंगीकार करके भी इन्द्रिय और कषायों की तीव्रता से चारित्र को तृण-समान समझते हैं, वे अधर्मी होकर पार्श्वस्थपने का सेवन करते हैं - अंगीकार करते हैं - ऐसे पार्श्वस्थ का स्वरूप कहा ।
सदासुखदासजी