पं-सदासुखदासजी
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अब कुशील जाति के भ्रष्ट मुनि का स्वरूप कहते हैं -
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इंदिचोरपरद्धा कसाय साबदभएण वा कई ।
उम्मग्गेण पलायंति साधुसत्थस्स दूरेण॥1309॥
अथवा कोई मुनि इन्द्रिय-चोरों से पीड़ित हो जाते ।
कषायरूप हिंसक पशुभय से, संघ से दूर चले जाते॥1309॥
सदासुखदासजी