पं-सदासुखदासजी
तो ते कुसीलपडिसेवणावणे उप्पधेण धावंता ।
सण्णाणदीसु पडिदा किलेससुत्तेण वुढ्ढंति॥1310॥
वे मुनि प्रतिसेवन कुशीलवन में कुमार्ग में गमन करें ।
संज्ञा-सरिता में गिरकर वे दुख प्रवाह में जा डूबें॥1310॥
सदासुखदासजी