सण्णाणदीसु ऊढा वुढ्ढा थाहं कहंपि अलहंता ।
तो ते संसाररोदधिमदंति बहुदुक्खभीसम्मि॥1311॥
संज्ञा-सरिता में न उन्हें मिलता न कहीं पर भी स्थान ।
अतः प्रवेश करें संसार-समुद्र मध्य जो बहु दुःखवान॥1311॥
अन्वयार्थ : कितने ही साधुजन इन्द्रियरूपी चोरों द्वारा उपद्रव को प्राप्त होकर और कषायरूपी दुष्ट तिर्यंचों के भय से साधु सार्थ को दूर से छोडकर/रत्नत्रयमार्ग को छोडकर उन्मार्ग से भाग जाते हैं/उन्मार्ग में चले जाते हैं ।

  सदासुखदासजी