
आसागिरिदुग्गाणि य अगिम्म तिदंडकक्खडसिलासु ।
ऊलोडिदपब्भट्टा खुप्पंति अणंतियं कालं॥1312॥
आशा गिरि अरु दुर्ग लांघ त्रय दंड शिलाओं पर गिरते ।
काल अनन्त बिताते भव-सागर में वे खाते गोते॥1312॥
अन्वयार्थ : और वे कुशील-भ्रष्ट मुनि आशारूपी पर्वत के शिखर से गिरकर मन- वचन-काय की कुटिल प्रवृत्तिरूप कर्कश शिला पर लोटते हुए भ्रष्ट होकर अनंतकाल व्यतीत करते हैं ।
सदासुखदासजी