+ अर्थ - और वे कुशील-भ्रष्ट मुनि आशारूपी पर्वत के शिखर से गिरकर मन- -
बहुपावकम्मकरणाडवीसु महादीसु विप्पणट्ठा वा ।
अद्धिट्ठणिव्वुदिपधा भमंति सुचिरंपि तत्थेव॥1313॥
अशुभकर्मरूपी महती अटवी में वे भटकें चिर काल ।
शिवपुर पथ को लखें कभी नहिं वहीं भ्रमण करते चिरकाल॥1313॥
अन्वयार्थ : कुशील मुनि बहुत पापकर्म करने रूप महा-अटवी में जाकर नष्ट होते हैं तथा नहीं देखा है निर्वाण मार्ग को जिनने, ऐसे भ्रष्ट मुनि चिरकालपर्यंत संसार में भ्रमण करते हैं ।

  सदासुखदासजी