देरेण साधुसत्थं छंडिय सो उप्पधेण खु पलादि ।
सेवदि कुसीलपडिसेवणाओ जो सुत्तदिठ्ठाओ॥1314॥
साधु संघ को छोड़ दूर से ही कुमार्ग में वे दौड़ें ।
आगम-कथित कुशील मुनि के दोषों को वे ग्रहण करें॥1314॥
अन्वयार्थ : वे (भ्रष्ट मुनि) साधुओं के संघ का दूर ही से त्याग करके एकाकी होकर उन्मार्ग में प्रवर्तन करते हैं, वे कुशीलप्रतिसेवना सेवन करतेे हैं (भ्रष्ट मुनियों की जो क्रिया जिनसूत्र में बतलाई है, उस क्रिया को करने लगते हैं ।)

  सदासुखदासजी