इंदियकसायगुरुगत्तणेण चरणं तणं व पस्संतो ।
णिद्दंधसो भवित्ता सेवदि हु कुसील सेवाओ॥1315॥
तीव्र कषाय और इन्द्रिय वश होकर चारित को तृण-सम ।
मानें, अरु निर्लज्ज हुए वे करते हैं कुशील-सेवन॥1315॥
अन्वयार्थ : जो इन्द्रिय और कषाय के तीव्र परिणाम के कारण अपने चारित्र को तृण/ तिनके के बराबर गिनते हुए चारित्र से भ्रष्ट होते हैं, वे निर्लज्ज होकर कुशील संबंधी क्रिया का आचरण करते हैं । इस प्रकार कुशीलजाति के भ्रष्ट मुनि का स्वरूप कहा ।

  सदासुखदासजी