पं-सदासुखदासजी
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अब यथाछंदजाति के भ्रष्ट मुनि का स्वरूप कहते हैं -
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सिद्धिपुरमुवल्लीणा वि केेइ इंदियकसाय चोरेहिं ।
पविलुत्तचरणभंडा उवहदमाणाट्ट णिवद्दंति॥1316॥
शिवपुर निकट पहँुचकर भी इन्द्रिय कषाय चोर लूटें ।
उनका चारित धन जिससे वे मान छोड़1 वापस लौटे॥1316॥
सदासुखदासजी