तो ते सीलदरिद्दा दुक्खमणंतं सदा वि पावंति ।
बहुपरियणो दरिद्दो पावदि तिव्वं जधा दुक्खं॥1317॥
यथा बहुत परिवार सहित नर हो दरिद्र बहु दुःख पावे ।
वैसे वे मुनि शील रहित होकर दरिद्र बहु दुःख पावें॥1317॥

  सदासुखदासजी