
सो होदि साधुसत्थादु णिग्गदो जो भवे जधाछंदो ।
उस्सुत्तमणुवदिट्ठं च जधिच्छाए विकप्पंतो॥1318॥
साधु संघ को छोड़ मुनि उत्सूत्र कल्पना करते हैं ।
अपनी इच्छा से एेसे मुनि यथाच्छन्द कहलाते हैं॥1318॥
अन्वयार्थ : कितने ही मुनि निर्वाणपुरी के प्रति गमन करने में उद्यमी होने पर भी इन्द्रिय और कषाय रूप चोरों द्वारा चारित्ररूप धन-संपदा नष्ट करके और मुनिपने का अभिमान/संयम के सन्मान को नष्ट करके उलटे संसार को ही लौट आते हैं । पश्चात् शील जो अपना सत्यार्थ निज स्वभाव, उससे रहित शील-दरिद्री होकर सदाकाल संसार में अनंत दु:ख को भोगते हैं । जैसे बहुत बडे परिवार वाला व्यक्ति निर्धन दरिद्री होकर महादु:ख को पाता - भोगता है । तैसे ही निजस्वभाव से रहित होकर जीव त्रस-स्थावर योनियों में घोर दु:ख पाता है और शील नष्ट हो जाने से साधु मुनियोें के संघ को छोडकर निकल जाता है, तब सूत्रविरुद्ध गुरुओं के उपदेश रहित यथेच्छ - मनचाही कल्पना करता हुआ स्वछन्द हो जाता है ।
सदासुखदासजी