जो होदि जधाछंदो हु तस्स धणिदंपि संजमिंत्तस्स ।
णत्थि दु चरणं खु होदि सम्मत्तसहचारी॥1319॥
बहुत संयमी हो परन्तु नहिं चारितवन्त, स्वच्छन्द मुनि ।
चारित समकित का सहचारी अतः उसे चारित्र नहीं॥1319॥
अन्वयार्थ : जो मुनि स्वेच्छाचारी है, वह अतिशय रूप संयम में प्रवर्तन करे तो भी उसके चारित्र नहीं होता । चारित्र है, वह सम्यक्त्व का सहचारी साथी है । अत: सम्यक्त्व सहित के ही चारित्र होता है । अपनी इच्छा से सूत्रविरुद्ध आचरण करे, उसके सम्यक्त्व भी नहीं और चारित्र भी नहीं है ।

  सदासुखदासजी