
इंदियकसायगुरुगत्तणेण सुत्तं पमाणमकरंतो ।
परिमाणेेदि जिणुत्ते अत्थे सच्छंददो चेव॥1320॥
इन्द्रिय-कषाय गुरुता के कारण नहिं आगम प्रमाण करता ।
अपनी इच्छा से जिनोक्त सूत्रों का अर्थ ग्रहण करता॥1320॥
अन्वयार्थ : जो साधु इन्द्रिय और कषाय की तीव्रता से जिनेन्द्रदेव द्वारा प्रतिपादित सूत्र को/आगम को प्रमाणित नहीं करता, वह जिनेन्द्र कथित अर्थ की अवज्ञा करता है, जिनोक्त अर्थ में भी स्वच्छंद - मार्ग रहित होकर प्रमाण करता है/यथार्थ तत्त्व को स्वीकार नहीं करता, वह साधु स्वच्छंद है - जिनेन्द्र के सत्यार्थ मार्ग से भ्रष्ट है । इस प्रकार यथाच्छंद - स्वच्छंद का स्वरूप कहा ।
सदासुखदासजी