
इंदियकसायदोसेहिं अधवा सहमण्णजोगपरितंतो ।
जो उव्वायदि सो होदि णियत्तो साधुसत्थादो॥1321॥
इन्द्रिय अरु कषाय दोष से योग क्रिया से च्युत होता ।
जो चारित से गिर जाता वह श्रमण संघ से च्युत होता॥1321॥
अन्वयार्थ : कोई इन्द्रिय और कषायों के दोषों के कारण चारित्र से चलायमान होता है अथवा सामान्य से मन-वचन-काय रूप योगों के दमन से प्राप्त चारित्र से भ्रष्ट होता है, वह साधु, साधुओं के संघ से निवृत्त होता है - रहित या छोडने वाला होता है ।
सदासुखदासजी