इंदियकसायवसिया केई ठाणाणि ताणि सव्वाणि ।
पाविज्जंतो दोसेहिं तेहिं सव्वेहिं संसत्ता॥1322॥
इन्द्रिय अरु कषायवश होकर अशुभरूप परिणाम करे ।
अशुभ स्थान प्राप्त कर वह, सब दोषों से संसक्त रहे॥1322॥
अन्वयार्थ : कितने ही मुनि इन्द्रियों और कषायों के वशीभूत होकर संपूर्ण अशुभ परिणामों के स्थानों को प्राप्त होते हैं । इस प्रकार संसक्तजाति के भ्रष्ट मुनि का स्वरूप कहा ।

  सदासुखदासजी