
इय एदे पंचविधा जिणेहिं सवणा दुगुंच्छिदा सुत्ते ।
इंदियकसायगुरुयत्तणेण णिच्चंपि पडिकुद्धा॥1323॥
इसप्रकार ये पाँचों मुनि हैं निन्दनीय जिन-आगम में ।
इन्द्रिय अरु कषाय बल सेवें नित्य विमुख जिन-आगम से॥1323॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार ये पंच प्रकार के भ्रष्ट मुनि जिनेन्द्र भगवान के परमागम में निंदनीय कहे हैं । ये निंद्य मुनि हैं । ये भेष तो मुनि का धरते हैं, लेकिन इन्द्रियों और कषायों की तीव्रता से सदा ही जिनधर्म से प्रतिकूल - पराङ्मुख रहते हैं । ऐसा पार्श्वस्थपना कहा ।
सदासुखदासजी