दुठ्ठा चवला अदिदुज्जया य णिच्चं पि समणुबद्धा य ।
दुक्खावहा य भीमा जीवाणं इंदियकसाया॥1324॥
चरितमोह के नित्य उदय से नित्य चपल अरु दुष्ट कहे ।
इन्द्रिय अरु कषाय भाव ये दुर्जय अरु दुःखरूप कहे॥1324॥
अन्वयार्थ : जीवों को ये पाँच इन्द्रियों और क्रोधादि चार कषायें अति दु:खकारी हैं/कैसी हैं ये इन्द्रियाँ और कषायंे? आत्मा को उपद्रवकारीपने के कारण दुष्ट हैं, अवस्थित नहीं; इसलिए चपल हैं । महान बलवान भी जीत नहीं सकते, इस कारण अति दुर्जय हैं, चारित्रमोह के तीव्र उदय से बारम्बार आत्मा को बाँधते हैं, दु:ख को देने वाले हैं और अति भयकारी हैं ।

  सदासुखदासजी