
तरुतेल्लंपि पियंतो वत्थो जह वादि पूदियं गंधं ।
तध दिक्खिदो वि इंदियकसाय गंधं वहदि कोई॥1325॥
मधुर तेल पीकर भी बकरी-सुत छोड़े नहिं निज दुर्गन्ध ।
दीक्षित होकर भी कोई नहीं छोड़े विषय-कषाय दुर्गन्ध॥1325॥
अन्वयार्थ : जैसे बकरा सुगंधित तैल एवं इत्र को पीते हुए भी वह दुर्गंधरूप पसेव तथा मद को ही उगलता है । तैसे ही कितने पुरुष जिनदीक्षा ग्रहण करके संयम धारण करते हुए भी मिथ्यादर्शन तथा चारित्रमोह के तीव्र उदय से इन्द्रियों के विषयों को ही चाहता है एवं क्रोधादि कषाय से उत्पन्न मलिनता को ही प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी