भुंजंतो वि सुमोयणमिच्छदि जध सूयरो समलमेव ।
तध दिक्खिदो वि इंदियकसायमलिणो हवदि कोइ॥1326॥
ज्यों शूकर स्वादिष्ट अशन खाकर भी मल भक्षण करता ।
त्यों दीक्षित होकर कोई इन्द्रिय कषायमल ही भखता॥1326॥
अन्वयार्थ : जैसे ग्राम शूकर1 सुन्दर मेवा-मिष्टान्न का भोजन करने पर भी विष्टा को ही भक्षण करने की इच्छा करता है । तैसे ही कोई जिनदीक्षा ग्रहण करके भी भ्रष्ट होकर इन्द्रियों के विषयों की लालसा करता है तथा कषायों के आधीन होता है ।

  सदासुखदासजी