पं-सदासुखदासजी
वाह भएण पलादो जूहं दट्ठूण वागुरापडिदं ।
सयमेव मआ वागुरमदीदि जह जूहतण्हाए॥1327॥
यथा व्याधभय से भागा मृग स्वजन प्रेम से फँसता है ।
स्वयं जाल में फँसे मोह से, त्यों मुनि विषयों में॥1327॥
सदासुखदासजी