पंजरमुक्को सउणो सुइरं आरामए सुविहरंतो ।
सयमेव पुणो पंजरमदीदि जध णीडतण्हाए॥1328॥
ज्यों पिंजरे से उड़कर पक्षी स्वेच्छा से विचरण करता ।
किन्तु मोहवश निज घर के, वह पुनः पींजरे में आता॥1328॥

  सदासुखदासजी