
बंधणमुक्को पुनरेव बंधणं सो अचेयणोदीदि ।
इंदियकसायबंधणमुवेदि जो दिक्खिदो संतो॥1334॥
दीक्षित होकर भी जो इन्द्रिय अरु कषाय के वश होता ।
बन्धन मुक्त हुआ वह अज्ञानी फिर बन्धन को पाता॥1334॥
अन्वयार्थ : जो दीक्षा ग्रहण करके भी इन्द्रिय-कषाय के बंधन को प्राप्त होता है, वह अज्ञानी बंधन से छूटा हुआ भी पुन: बंधन को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी