मुक्को वि णरो कलिणा पुणो वि तं चेव मग्गदि कलिं सो ।
जो दिक्खिदो वि इंदिय कसायमइयं कलिमुवेदि॥1335॥
दीक्षित होकर भी जो इन्द्रिय अरु कषाय के वश होवे ।
मुक्त हुआ वह कलिकाल से किन्तु पुनः कलि को खोजे॥1335॥
अन्वयार्थ : जो साधु दीक्षित होकर भी कषाय और इन्द्रिय विषयरूप कलह को प्राप्त होता है । तो वह क्या करता है? जैसे कोई व्यक्ति कलह का त्याग करके/कलह से छूटकर भी पुन: उसी कलह को स्वीकार करता है, तैसे अनर्थ करता है ।

  सदासुखदासजी