पं-सदासुखदासजी
सो णिच्छदि मोत्तु जे हत्थगयं उम्मुयं सपज्जलियं ।
सो अक्कमदि कण्हसप्पं छांद वग्घं च परिमसदि॥1336॥
हाथ लिया अंगार न छोड़े, कृष्ण सर्प को वह लाँघे ।
क्षुधित व्याघ्र को पकड़े वह मुनि, मुक्त नहीं होना चाहे॥1336॥
सदासुखदासजी