सो कंठल्लगिदसिलो दहमत्थाहं अदीदि अण्णाणी ।
जो दिक्खिदो वि इंदिय कसायवसिगो हवे साधु॥1337॥
दीक्षित होकर भी जो इन्द्रिय अरु कषाय के हो आधीन ।
पत्थर बाँध गले में वह अज्ञानी सर में करें प्रवेश॥1337॥
अन्वयार्थ : जो साधु दीक्षित होकर भी कषाय और इन्द्रियविषयरूप परिणाम को स्वीकार करता है, वह जलते अंगारों को हाथ से छोडना नहीं चाहता अथवा काले सर्प को ग्रहण करना/पकडना चाहता है अथवा तो भूखे व्याघ्र को आलिंगन करता है अथवा कोई अज्ञानी कंठ में शिला को बाँधकर अगाध सरोवर में प्रवेश करता है ।

  सदासुखदासजी