
इंदियगहोबनिठ्ठो उवसिठ्ठो ण दु गहेण उवसिठ्ठो ।
कुणदि गहो एयभवे दोसं इदरो भवसदेसु॥1338॥
ग्रह से गस्त नहीं ग्रह पीड़ित, इन्द्रिय ग्रह वश ग्रह पीड़ित ।
ग्रह दुःखदायी इस भव में ही, इन्द्रिय ग्रह है भव-भव में॥1338॥
अन्वयार्थ : इन्द्रियरूपी पिशाच के द्वारा ग्रहण किया गया पुरुष गृहीत/परवश है; दूसरे पिशाच से ग्रहण किया गया गृहीत-परवश नहीं है । दूसरा पिशाच तो एक भव में ही दोष करता है, अनर्थ करता है और इन्द्रियों के विषय संख्यात, असंख्यात, अनंत भवों में अनर्थकारक हैं ।
सदासुखदासजी