होदि कसाउम्मत्तो उम्मत्तो तध ण पित्तउम्मत्तो ।
ण कुणदि पित्तुम्मत्तो पावं इदरो जधुम्मत्तो॥1339॥
पित्तोन्मत्त नहीं उन्मत्त, कषायोन्मत्त ही मत्त अरे ।
जो कषाय से पाप करे, नहिं पित्त ग्रस्त वह पाप करे॥1339॥
अन्वयार्थ : जैसे कषायों से उन्मत्त होकर पाप करता है, वैसे पित्त से उन्मत्त होकर पाप नहीं करता है; क्योंकि कषायों से उन्मत्त तो हिंसादि पापों में प्रवर्तन करता है और कर्म की स्थिति को बढाता है और पापप्रकृतियों में अनुभाग बढाता है तथा पुण्य प्रकृतियों का अनुभाग घटाता है । ऐसा अनर्थ पित्तोन्मत्त नहीं करता है ।

  सदासुखदासजी