इंदियकसायमइओ णरं पिसायं करंति हु पिसाया ।
पावकरणवेलंबं पेच्छणयकरं सुयणमज्झे॥1340॥
विषय-कषाय पिशाच मनुज को भी पिशाच जैसे करते ।
सज्जन के सम्मुख भी उससे पाप क्रियायें कर बातें॥1340॥
अन्वयार्थ : इन्द्रिय कषायरूपी पिशाच द्वारा यह मनुष्य पिशाचरूप किया जाता है तथा पाप करने में विलम्ब नहीं करता है एवं सज्जनों के बीच निंदनीय होता है ।

  सदासुखदासजी