कुलजस्स जस्स मिच्छत्तगस्स णिधणं वरं खु परिसस्स ।
ण य दिक्खिदेण इंदियकसायवसिएणा जेदुं जे॥1341॥
यश के अभिलाषी कुलीन नर का मरना भी श्रेष्ठ कहा ।
विषय-कषायों के वश मुनि का जीना भी नहिं श्रेष्ठ कहा॥1341॥
अन्वयार्थ : अपने यश की इच्छा करनेवाले और महान कुल में उत्पन्न हुए पुरुष को मरण स्वीकार करना श्रेष्ठ है, परन्तु जिनेन्द्र की दीक्षा ग्रहण करके इन्द्रिय-कषाय के वशीभूत होकर जीना श्रेष्ठ नहीं है ।

  सदासुखदासजी