
जध सण्णाद्धो पग्गहिदचावकंडो रधी पलायंतो ।
णिंदिज्जदि तध इंदियकसावसिगो वि पव्वज्जिदो॥1342॥
रथ पर धनुष-बाणयुत योद्धा भागे तो निन्दित होता ।
इन्द्रिय अरु कषाय वश दीक्षित मुनि भी त्यों निन्दित होता॥1342॥
अन्वयार्थ : जैसे ग्रहण किया है धनुष-बाण जिसने और सजा हुआ ऐसा रथी रणांगण में पहुँचकर भागने लगता है तो वह सभी के द्वारा निंदनीय होता है, तैसे ही दीक्षा ग्रहण करके और इन्द्रिय कषायों के वशीभूत हो जाये तो जगत में निंदने योग्य होता है ।
सदासुखदासजी