जध मिक्खं हिडंतो मउडादि अलंकिदो गहिदसत्थो ।
णिंदिज्जइ तध इंदियकसायवसिगो वि पव्वज्जिदो॥1343॥
शस्त्रों और मुकुट से सज्जित कोई नर भिक्षा माँगे ।
विषय कषायाधीन साधु त्यों दीक्षित हो निन्दित होवे॥1343॥
अन्वयार्थ : जिसप्रकार मुकुट, हार आदि आभूषणों से भूषित/सजा हुआ और समस्त शस्त्रों को ग्रहण किये होने पर भी भिक्षा के लिए परिभ्रमण करे तो वह सब के द्वारा निंदा का पात्र होता है, उसी प्रकार जिनेश्वरी दीक्षा ग्रहण करके जो इन्द्रिय और कषायों के आधीन होता है, वह मुनि निंदा करने योग्य है ।

  सदासुखदासजी