
इंदियकसायवसिगो मुंडो णग्गो य जो मलिणगत्तो ।
सो चित्तकम्मसमणोव्व समणरूवो असमणो हु॥1344॥
मुन्दित, नग्न, मलिन तन भी हो किन्तु विषय-कषाय वशी ।
श्रमण-चित्रवत् वह श्रामण्य रूपधारी पर श्रमण नहीं॥1344॥
अन्वयार्थ : जो केशलोंच करने से मुंड है, नग्न है और स्नानादि रहित होने से शरीर मलिन है । ऐसा मुनि होकर भी इन्द्रिय-कषायों के वश होता है, वह चित्राम के साधु के समान मुनिजै सा दिखता है, वास्तविक मुनि नहीं है ।
सदासुखदासजी