णाणं दोसे णासिदि णारस्स इंदियकसायविजयेण ।
आउहरणंप हरणं जह णासेदि अरिं ससत्तस्स॥1345॥
इन्द्रिय और कषाय विजय से ज्ञान दोष सब दूर करे ।
यथा शक्तियुत नर के शस्त्र कवच शत्रु का नाश करें॥1345॥
अन्वयार्थ : जीव के इन्द्रिय और कषायों पर विजय करने पर ज्ञान दोषों का नाशक होता है और इन्द्रिय-कषायों पर विजय बिना ज्ञानाभ्यासपना तथा ज्ञानीपना वृथा है । जैसे पराक्रमी योद्धा के हाथ में मारने वाला शस्त्र वैरी को मारता है और कायर के हाथ का शस्त्र वैरी का घात करने में समर्थ नहीं होता ।

  सदासुखदासजी