
णाणंपि कुणदि दोसे णरस्स इंदियकसायदोसेण ।
आहारो वि हु पाणो णरस्स विससंजुदो हरदि॥1346॥
विषय-कषाय दोष से नर में ज्ञान दोष उत्पन्न करे ।
यथा प्राण रक्षक भोजन विष से प्राणों का घात करे॥1346॥
अन्वयार्थ : मनुष्य के इन्द्रियों के विषय और कषायों के दोष ज्ञान को भी दूषित करते हैं । जैसे विष-मिश्रित सुन्दर आहार भी प्राणों/जीवन का नाश करता है ।
सदासुखदासजी