
णाणं पि गुणो णासेदि णरस्स इंदियकसायदोसेण ।
अप्पबधाए सत्थं होदि हु का पुरिसहत्थगयं॥1348॥
विषय-कषाय दोष वश गुण भी ज्ञान मनुज के नष्ट करे ।
कायर नर के हाथ शस्त्र भी उसका ही घातक होवे॥1348॥
अन्वयार्थ : जैसे का-पुरुष/डरपोक/कायर आदमी के हाथ में आया हुआ शस्त्र अपने ही मरण के लिये होता है, तैसे ही मनुष्य के इन्द्रिय-कषायों के दोष से ज्ञानाभ्यास भी गुणों का नाश करनेवाला होता है । विषयों का लम्पटी तीव्र कषायी का ज्ञान तीव्र बंध को करता है । ज्ञानी/शास्त्रों का जानकार होकर निंद्य कर्म करता है तो लोक उसका अपवाद करता है, तिरस्कार करता है ।
सदासुखदासजी