
सबहुस्सुदो वि अवमाणिज्जदि इंदियकसायदोसेण ।
णरमाउधहत्थंपि हु मदयं गिद्धा परिभवंति॥1349॥
इन्द्रिय और कषाय दोष से शास्त्रज्ञों का भी अपमान ।
यथा हस्तगत अस्त्र परन्तु गिद्ध मृतक भक्षण करते॥1349॥
अन्वयार्थ : जैसे आयुध है हाथ में जिसके, ऐसे मृतक मनुष्य/शव का गृद्धपक्षी तिरस्कार करते हैं अर्थात् मुर्दे के हाथ में तलवार है, किन्तु उस तलवार से गृधपक्षी नहीं डरते, उसे खाते ही हैं, तैसे ही बहुश्रुत का धारक भी इन्द्रिय कषायों के कारण अवज्ञा को पाता है ।
सदासुखदासजी