
इंदियकसायवसिगो बहुस्सुदो वि चरणे ण उज्जमदि ।
पक्खीव छिण्णपक्खो ण उप्पडदि इच्छमाणो वि॥1350॥
इन्द्रिय अरु कषायवश बहुश्रुत भी न करे चारित का यत्न ।
पर-विहीन पक्षी नहिं उड़ सकता चाहे वह करे प्रयत्न॥1350॥
अन्वयार्थ : इन्द्रियों के विषय तथा कषायों के वशीभूत पुरुष बहुश्रुत/शास्त्रज्ञ होकर भी चारित्र में उद्यमी नहीं हो सकता । पापों से भयभीत होकर पापों को त्यागना चाहता है, किन्तु विषयों के अनुराग से, कषायों की तीव्रता से पाप के ही मार्ग में प्रवर्तन करता है । जैसेजिसके पंख कट गये हैं, ऐसा पक्षी उडने की इच्छा करे तो भी उड नहीं सकता है ।
सदासुखदासजी