
णस्सदि सगंपि बहुगं पि णाणमिंदियकसाय सम्मिस्सं ।
विससम्मिसिद दुट्ठं णस्सदि जध सक्कराकढिदं॥1351॥
बहुत ज्ञान भी स्वयं नष्ट हो इन्द्रिय और कषायों से ।
जैसे शक्कर मिला दूध भी नष्ट होय विष मिलने से॥1351॥
अन्वयार्थ : इन्द्रियों के विषय और कषायों से मिश्रित बहुत सारा ज्ञान भी अपने आप ही नाश को प्राप्त हो जाता है । जैसे मिश्री मिलाकर अग्नि पर ओंटाया हुआ दूध भी विष मिश्रित होने से स्वयं ही नष्ट हो जाता है ।
सदासुखदासजी