
इंदिय कसायदोसमलिणं णाणं ण बट्टदि हिदे से ।
वट्टदि अण्णस्स हिदे खरेण जह चंदणं ऊढं॥1352॥
विषय-कषाय दोष से ज्ञान मलिन हो तो नहिं उपकारी ।
पर का ही उपकार करे ज्यों खर1 पर हो चन्दन भारी॥1352॥
अन्वयार्थ : विषय और कषाय के दोष से दूषित ज्ञान अपने हित में प्रवर्तन नहीं करता है । जैसे गधे के द्वारा ढोया गया चन्दन का भार अन्य लोगों को सुगंधी देता है, अन्य के हित में प्रवर्तता है, पर स्वयं तो बोझा ही ढोता है, सुगंध ग्रहण नहीं करता । तैसे ही विषयानुरागी तथा कषायी पुरुष ज्ञान के अभ्यास तथा व्याख्यान द्वारा दूसरे लोगों को धर्म में प्रवर्तन कराकर अन्य के ही हित में प्रवृत्ति कराता है, परन्तु स्वयं विषय-कषायों में अंधा होकर अपने आत्मा को नरक-तिर्यंच गति में ही पटकता है ।
सदासुखदासजी