
इंदियकसायणिग्गहणिमीलिदस्स हु पयासदि ण णाणं ।
रत्तिं चक्खुणिमीलस्स जधा दीवो सुपज्जलिदो॥1353॥
इन्द्रिय और कषाय विजय से रहित ज्ञान नहिं करे प्रकाश ।
यथा बन्द नेत्रोंवाले को जलता दीप न करे प्रकाश॥1353॥
अन्वयार्थ : जैसे रात्रि में दीपक समस्त वस्तुओं को प्रकाशित करने वाला है, परन्तु जिसने दोनों नेत्र निमीलित/बंद हो रहे हैं, ऐसे अन्ध व्यक्ति को दीपक कुछ भी दिखलाने में समर्थ नहीं है । तैसे ही इन्द्रियों के विषय और कषायों का जिसने निग्रह नहीं किया तथा विषयों से जिसका हृदय मुद्रित हो रहा है/ढकरहा है, उसका ज्ञान प्रकाश नहीं करता - पदार्थ के यथार्थ स्वरूप को प्रकाशित नहीं कर सकता है ।
सदासुखदासजी