
इंदियकसायमइलो वाहिरकरणणिहुदेण वेसेण ।
आवहदि को वि विसए सउणो वींदसगेणोव॥1354॥
विषय-कषाय मलिन मुनि खुद को ढकता बाह्यक्रिया करके ।
निश्चल पक्षी के समान निज भोग हेतु वह विषय गहे॥1354॥
अन्वयार्थ : कोई बाह्य में गमनागमनादि क्रिया में निश्चल होकर साधु जैसा आचरण करता है और अन्तरंग में इन्द्रियों के विषय तथा कषायों से मलिन हुआ विषयों को ही चाहता है, वह ठगिया है, साधु नहीं है ।
सदासुखदासजी