घोडगलिंडसमाणस्स तस्स अब्भंतरम्मि कुधिदस्स ।
बाहिरकरणं किं से काहिदि बगणिहुदकरणस्स॥1355॥
ऊपर चिकनी भीतर कुत्सित अश्व-लीद सम साधु की ।
अन्तर परिणति, बाह्य क्रिया क्या करे उसे जो बक-वृत्ति1॥1355॥
अन्वयार्थ : जैसे घोडे की लीद बाहर से चिकनी दिखती है और अन्दर में महा दुर्गंधरूप मलिन रहती है, उसकी बाहर की उज्ज्वलता से क्या लाभ? तैसे ही जो बाह्य में तो नग्नता तथा शीत, उष्णादि परीषह को सहते हैं और अनशनादि तपों से तो उज्ज्वल हैं, लेकिन अन्दर विषयों की, इस लोक-परलोक की चाह तथा अभिमानादि कषायों से मलिन हैं, उनका आचरण बगुले के समान, बाहर में इन्द्रियों को रोक रखा है, परन्तु अंतरंग में दुष्टता है, उसके बाह्य व्रत-तप से क्या सिद्धि? सब वृथा है ।

  सदासुखदासजी