बाहिरकरणविसुद्धी अब्भंतर करणसोधणत्थाए ।
ण हु कुंडयस्स सोधी सक्का सतुसस्स कादुं जे॥1356॥
बाह्य क्रिया की शुद्धि अन्तःकरण शुद्धि के लिए कही ।
जैसे छिलका सहित धान्य की अन्तः शुद्धि न हो सकती॥1356॥
अन्वयार्थ : बाह्य क्रिया की शुद्धि की उपयोगिता अभ्यंतर विनयादि तथा ध्यानादि की शुद्धि के लिये होती है । जैसे छिलका सहित तन्दुल की अभ्यंतर की लालिमा दूर नहीं होती । पहले छिलका दूर होगा, तब अभ्यंतर की लालिमा दूर होगी, तैसे ही जिसका बाह्य आचरण शुद्ध होगा, उसी के अभ्यंतर आत्मपरिणाम शुद्ध होंगे । इसलिए बाह्य प्रवृत्ति शुद्ध करके आत्मा की शुद्धता करो ।

  सदासुखदासजी