अब्भंतरसोधीए सुद्धं णियमेण बाहिरं करणं ।
अब्भंतरदोसेण हु कुणदि णरो बाहिरं दोसं॥1357॥
अभ्यन्तर शुद्धि से ही हो बाह्य शुद्धि यह नियम कहा ।
अभ्यन्तर दोषों के कारण बाह्य दोष यह नर करता॥1357॥
अन्वयार्थ : अभ्यंतर आत्मपरिणाम की शुद्धता से बाह्य क्रिया की शुद्धता नियम से होती है और अभ्यंतर दोषों से युक्त व्यक्ति, बाह्य दोषों को नियम से करता ही है ।

  सदासुखदासजी