लिंगं च होदि अब्भंतरस्स सोधीए बाहिरा सोधी ।
भिउडीकरणं लिंगं जह अंतो जाद कोधस्स॥1358॥
अभ्यन्तर शुद्धि की होती बाह्य विशुद्धि से पहचान ।
जैसे भृकुटी चढ़ी हुई तो क्रोध भाव अन्तर में जान॥1358॥
अन्वयार्थ : यह बाह्य शुद्धता अभ्यंतर शुद्धता का लिंग/चिः है । जैसे - जिसे अंतरंग में क्रोध उत्पन्न हो, उसकी भ्रकुटी का वक्र होना चिः है ।

  सदासुखदासजी