महुलित्तं असिधारं तिक्खं लेहिज्ज जध णरो कोई ।
तध विसयसुहं सेवदि दुहावहं इहहि परलोगे॥1360॥
शहद लपेटी तीव्र धार युत ज्यों कोई चाटे तलवार ।
त्यों नर भोगे विषय सुखों को उभय लोक में जो दुःखकार॥1360॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई मूर्ख मनुष्य शहद लपेटी तीक्ष्ण धार वाली तलवार को चाटता है, उसमें जीभ को छूने मात्र तो मिष्टता है और जीभ कट जाने पर महादु:ख पाता है/भोगता है । तैसे ही इस लोक और परलोक में दु:ख को देने वाले विषयसुखों का मूर्ख सेवन करता है ।

  सदासुखदासजी