पं-सदासुखदासजी
सद्देण मओ रूवेण पदंगो वणगओ वि फरिसेण ।
मच्छो रसेण भमरो गंधेण य पाविदो दोसं॥1361॥
मृग शब्दों, से पतंगरूप से, वनगज स्पर्शन के वश से ।
मछली रस से, भ्रमर गन्ध के वश से प्राण गँवाते हैं॥1361॥
सदासुखदासजी